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Mulakaat



- संदीप कुलश्रेष्ठ
इक मुलाकात से
दो ख़याल मिलते हैं
और ख़यालों के दौर मैं
कुछ उलझनें सुलझ जाती हैं
कुछ सुलझी हुई खामोशियाँ
बिखर जाती है
सवरने के लिए
कुछ पैघाम आते है
कुछ ख्वाहिशें मुस्कुराती है
कुछ नये वादे मुकम्मल होते हैं
कुछ माज़ी मैं क़ैद ही रहते हैं
रहने ही चाहिए, शायद
आओ इक मुलाक़ात करें
और रुख़ करें साहिल की जानिब
जहाँ मंज़िल का कोई फलसफा नहीं
बस बैठे ही रहना है
ख़यालों के दरमियाँ

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तुम से ही मेरा जीवन है

तुम्हारे जाने के बाद जीवन का सारांश समझ आ गया वो जो अपने होते है उन्ही से जीवन होता है एक छोटी सी बात पे मैने कुछ बोल दिया तुमने उसको बड़ा बना कर बेवजह मोल दिया किसकी ग़लती कौन जाने बस देखता हूँ दरवाज़े को कोई दस्तक दे शायद क्या करूँ , किससे बात करूँ अकेला हूँ पर भीड़ है बौहत थक गया हूँ अपने से लड़ते लड़ते तुम्हारे बिना एक प्याला चाय का भी स्वाद नहीं देता बस तुम हो सामने तो ज़िंदगी कट जाएगी तुम से ही मेरा जीवन है

कहती है वो

रात मैं जिस्मों के अलाव जलते हैं जब मैं अपने जिस्म से उसका जिस्म हौले से छु लेता हू वक़्त रुक जाता है उस तपिश मैं हम दोनो निखर जाते हैं सहर होते ही जब ओस पत्तियॉं की पेशानी को चूमती है मैं अपनी गहरी नीद की आगोश मैं समाया, दीन दुनिया से बेख़बर पड़ा रहता हूँ एक आहट होती है और वो एक टहनी की तरह मेरे जिस्म से लिपट जाती है, और मैं गुस्से मैं कहता हूँ “सोने दो अभी” उसकी गुदगुदी से मैं मुश्किल से उठता हूं, सफेद बनियान और पजामा पहने हुए उठते ही हाथ चश्मे पर जाता है और वो मुझे देखकर निहारती है मैं उसके नहाने का पानी गरम करता हूँ वो चुटकुले पढ़कर मुझे हँसाती है फिर हम दोनो सुनते हैं “गुलज़ार” का लिखा एक पुराना नग़मा एक प्याली सुबह की चाय के साथ “तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीन है मुझे प्यार तुम से नहीं है नहीं है” मैं अपना कलाम भी दिखाता हूँ कुछ बिखरे पन्नों मैं छुपाया हुआ फिर किसी बात पर हम लड़ते हैं रूठ जाती है वो, बच्चे की तरह मुझे मानना भी नही आता उसको हसाने का...