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रेल की पटरी

मेरे घर पे पीछे एक रेल की पटरी गुज़रती है या यूँ कहो की लोग गुज़रते हैं कुछ लोग तो हैं ट्रेन मैं सफ़र करने वाले कुछ पटरी को रास्ता समझ कर बात-चीत करते हुए गुज़रते हुए मैं जब भी बाल्कनी मैं खड़े होकर चाय की प्याली लिए सुबह रेल गाड़ियों को निहारता हूँ तो कुछ लोग मेरी इमारत को देखते हैं नज़र पॅड ही जाती है ना चाहते हुए भी उनकी तब शायद मैं भी उनके सफ़र का हिस्सा बन जाता हूँ उन भागते हुए पेड़ों की तरह जो रास्ते मैं हर मुसाफिर को मिलते हैं जो उनको रास्ता दिखाते हैं मैं तो कोई रास्ता नही दिखाता बस ठिठक जाता हूँ समय की तरह दिन मैं शायद 25-30 ट्रेन आती हैं हॉर्न की आवाज़ से अब मंज़िल पता चलती है ये शायद पुणे वाली शताब्दी गयी हमेशा जल्दी मैं रहती है कम्बख़्त पॅसेंजर ट्रेन तो मेरे घर के पीछे रुक जाती है उसको सिग्नल भी कोई नही देता लोग कूद कर अंगड़ाई लेते हुए इधर उधर ताकते हैं नज़र मेरी भी पड़ती है उधर फिर सोचने लगता हूँ की ये सब कहाँ से चले थे और कहाँ जा रहे होंगे सफ़र कहाँ से कहाँ का है ये शहर इनकी मंज़िल है या एक और ट्रेन बदलनी...

Jism Tarasha tha tumhara

Aaj Tumhara Din Hai

शब भर रहे

शब भर रहे बहके बहके ख्वाब आँख खुलती रही ज़हन खुलता गया सन्नाटे के शोर से वो जो बारिश की छत पटाहत थी गरज के कह निकली थी क्यों देखते हो ख्वाबों को नीद की आगोश मैं जब वापस गया पुराना ख्वाब तकिये की सिलवटों मैं खो गया नया ख्वाब आने को था फिर से टूटने के लिए . .

वो तारा देखा तुमने ?

वो तारा देखा तुमने ? चमकता सा , दमकता सा … वो तारा यहाँ भी है मीलों दूर तुम हो कहीं पर ये आसमान तो एक है इस सृष्टि की तरह क्या कर रही होगी तुम इस वक़्त ? बर्फ सी ठंड मैं कंबल मैं लिपटी हुई अकेलेपन से जूझती हुई अपने आप से रूठी हुई या किसी की यादों के हसीन पल को समेटे हुए खुली आँखों मैं ख्वाब भी होंगे कुछ अनसुलझे सवाल भी होंगे जो भी हो रहा होगा उस तारे ने तो देखा होगा मैं भी कुछ अकेला हूं तुम्हारी यादों मैं खोया हूं अभी देखा था छत से वो तारा यहाँ भी है मीलों दूर तुम हो कहीं मेरे लिए ही बनाई गयी ये तारा भी जानता है यही देखो ज़रा ध्यान से आसमान को …

हर रात हो इश्क़ की रात

एक तपिश सी थी जब तुमको छुआ था सर्द चाँद रात मैं जब उस गर्मी मैं तुम्हारे होठों ने मेरे होठों से कुछ कहना चाहा था मगर चुपके से छू लिया था मेरे होठों को फिर कुछ आग भी लगी थी दो भीगे जिस्मों मैं आज अब्र कह रहा है की कुछ छींटें गीरेंगी क्यों ना हम भी भीग जाए इस गीली रात के साए मैं , फिर रात को निचोड़ लेंगे और मोहब्बत के रंगों मैं भिगो देंगे , अपने तन - मन को यही खेल खेलेंगे जब तक है साथ हर रात हो इश्क़ की रात हर सहर हो मुस्कुराती हुई