Saturday, December 2, 2017

For a special friend

Kuch ahsaas ka jashn hai
Kuch Jahan ki pashemani
Dhoop na nikle,
Baadlon se ishq farmati hai wo
Ik khwabida tanhai se masruf Hai kabhi
Aur kabhi ruhani tasavvur se
Wo nazuk awaaz ki Mallika
Jab hazaron khwahishon ki baat kare
To aankh band karke
Kisi aur jahan main kho jayein
Ye man kahta Hai
Wo jo khalish hai unki aankhon main
awaaz banke
ik parwaaz dhoondi hai
kisi aur manzar ki jaanib

Monday, October 26, 2015

रेल की पटरी



मेरे घर पे पीछे
एक रेल की पटरी गुज़रती है
या यूँ कहो की लोग गुज़रते हैं
कुछ लोग तो हैं ट्रेन मैं सफ़र करने वाले
कुछ पटरी को रास्ता समझ कर
बात-चीत करते हुए गुज़रते हुए
मैं जब भी बाल्कनी मैं खड़े होकर
चाय की प्याली लिए सुबह रेल गाड़ियों को निहारता हूँ
तो कुछ लोग मेरी इमारत को देखते हैं
नज़र पॅड ही जाती है ना चाहते हुए भी उनकी
तब शायद मैं भी उनके सफ़र का हिस्सा बन जाता हूँ
उन भागते हुए पेड़ों की तरह
जो रास्ते मैं हर मुसाफिर को मिलते हैं
जो उनको रास्ता दिखाते हैं
मैं तो कोई रास्ता नही दिखाता
बस ठिठक जाता हूँ समय की तरह
दिन मैं शायद 25-30 ट्रेन आती हैं
हॉर्न की आवाज़ से अब मंज़िल पता चलती है
ये शायद पुणे वाली शताब्दी गयी
हमेशा जल्दी मैं रहती है कम्बख़्त
पॅसेंजर ट्रेन तो मेरे घर के पीछे रुक जाती है
उसको सिग्नल भी कोई नही देता
लोग कूद कर अंगड़ाई लेते हुए
इधर उधर ताकते हैं
नज़र मेरी भी पड़ती है उधर
फिर सोचने लगता हूँ की
ये सब कहाँ से चले थे
और कहाँ जा रहे होंगे
सफ़र कहाँ से कहाँ का है
ये शहर इनकी मंज़िल है
या एक और ट्रेन बदलनी है
आगे वाले स्टेशन से
मुझसे इन रैल्गाड़ियों का नाता सा है कुछ
मैं मुसाफिर हूँ किसी और परवाज़ का
ये मुसलसल चलती रहती हैं
मंज़िल का ठिकाना नहीं
मुझे बोहत से लोग देखते होंगे
जब जब मैं पटरियों की जानिब देखता हूँ
ये इक अजीब सी दास्तान है
ये बात तो माननी होगी
मैं एक छोटा और मामूली सा सही
पर उनका सफ़र मेरा सफ़र भी है

Thursday, February 10, 2011

शब भर रहे

शब भर रहे
बहके बहके ख्वाब
आँख खुलती रही
ज़हन खुलता गया
सन्नाटे के शोर से
वो जो बारिश की छतपटाहत थी
गरज के कह निकली थी
क्यों देखते हो ख्वाबों को
नीद की आगोश मैं
जब वापस गया
पुराना ख्वाब
तकिये की सिलवटों
मैं खो गया
नया ख्वाब आने को था
फिर से टूटने के लिए..

Wednesday, September 2, 2009

वो तारा देखा तुमने ?

वो तारा देखा तुमने ?
चमकता सा, दमकता सा
वो तारा यहाँ भी है
मीलों दूर तुम हो कहीं
पर ये आसमान तो एक है
इस सृष्टि की तरह
क्या कर रही होगी तुम इस वक़्त?
बर्फ सी ठंड मैं
कंबल मैं लिपटी हुई
अकेलेपन से जूझती हुई
अपने आप से रूठी हुई
या किसी की यादों के
हसीन पल को समेटे हुए
खुली आँखों मैं ख्वाब भी होंगे
कुछ अनसुलझे सवाल भी होंगे
जो भी हो रहा होगा
उस तारे ने तो देखा होगा
मैं भी कुछ अकेला हूं
तुम्हारी यादों मैं खोया हूं
अभी देखा था छत से
वो तारा यहाँ भी है
मीलों दूर तुम हो कहीं
मेरे लिए ही बनाई गयी
ये तारा भी जानता है यही
देखो ज़रा ध्यान से आसमान को

हर रात हो इश्क़ की रात

एक तपिश सी थी
जब तुमको छुआ था
सर्द चाँद रात मैं
जब उस गर्मी मैं
तुम्हारे होठों ने
मेरे होठों से कुछ
कहना चाहा था
मगर चुपके से
छू लिया था मेरे होठों को
फिर कुछ आग भी लगी थी
दो भीगे जिस्मों मैं
आज अब्र कह रहा है
की कुछ छींटें गीरेंगी
क्यों ना हम भी भीग जाए
इस गीली रात के साए मैं,
फिर रात को
निचोड़ लेंगे
और मोहब्बत के रंगों मैं
भिगो देंगे,
अपने तन-मन को
यही खेल खेलेंगे
जब तक है साथ
हर रात हो इश्क़ की रात
हर सहर हो मुस्कुराती हुई