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Mulakaat

- संदीप कुलश्रेष्ठ इक मुलाकात से
दो ख़याल मिलते हैं
और ख़यालों के दौर मैं
कुछ उलझनें सुलझ जाती हैं
कुछ सुलझी हुई खामोशियाँ
बिखर जाती है
सवरने के लिए
कुछ पैघाम आते है
कुछ ख्वाहिशें मुस्कुराती है
कुछ नये वादे मुकम्मल होते हैं
कुछ माज़ी मैं क़ैद ही रहते हैं
रहने ही चाहिए, शायद आओ इक मुलाक़ात करें
और रुख़ करें साहिल की जानिब
जहाँ मंज़िल का कोई फलसफा नहीं
बस बैठे ही रहना है
ख़यालों के दरमियाँ
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Tohfe

Main usko tohfe deta hoon kabhi shampoo to kabhi aata ya sabun ya ghar ka bana khaana ek baar kuch kalam bhi diye the kabhi khoobsoorat guldaan nahi diye ya sukoon dene wali filmon ki DVD aur kuch na sahi chandni raatien bhi na de paaya
Ye mera tariqa hai  kuch kahne ka kya kahna hai magar mujhe pata nahin ye harf jo hai "kuch"  bohat chhota sa hai "wasee" main mumkin ye kainaat hai
uske tohfe kuch muktalif hote hain wo apnee gamzada tasveerein  jo ki apne phone se kheenchtee hai wo mujhe bhejtee hai uske tohfe yahin tak nahin hai wo mujhe ek samandar bhar ke qahqahe bhi nazar karti hai usko mil bhi jaate hain  aise mauke jab ham saath hote hain
usko mere tohfe pasand aate hain (aisa usne kaha) wo mujhe ishq ka hadia pesh-e-khidmat karti hai

For a special friend

Kuch ahsaas ka jashn hai
Kuch Jahan ki pashemani
Dhoop na nikle,
Baadlon se ishq farmati hai wo
Ik khwabida tanhai se masruf Hai kabhi
Aur kabhi ruhani tasavvur se
Wo nazuk awaaz ki Mallika
Jab hazaron khwahishon ki baat kare
To aankh band karke
Kisi aur jahan main kho jayein
Ye man kahta Hai
Wo jo khalish hai unki aankhon main
awaaz banke
ik parwaaz dhoondi hai
kisi aur manzar ki jaanib

रेल की पटरी

मेरे घर पे पीछे एक रेल की पटरी गुज़रती है या यूँ कहो की लोग गुज़रते हैं कुछ लोग तो हैं ट्रेन मैं सफ़र करने वाले कुछ पटरी को रास्ता समझ कर बात-चीत करते हुए गुज़रते हुए मैं जब भी बाल्कनी मैं खड़े होकर चाय की प्याली लिए सुबह रेल गाड़ियों को निहारता हूँ तो कुछ लोग मेरी इमारत को देखते हैं नज़र पॅड ही जाती है ना चाहते हुए भी उनकी तब शायद मैं भी उनके सफ़र का हिस्सा बन जाता हूँ उन भागते हुए पेड़ों की तरह जो रास्ते मैं हर मुसाफिर को मिलते हैं जो उनको रास्ता दिखाते हैं मैं तो कोई रास्ता नही दिखाता बस ठिठक जाता हूँ समय की तरह दिन मैं शायद 25-30 ट्रेन आती हैं हॉर्न की आवाज़ से अब मंज़िल पता चलती है ये शायद पुणे वाली शताब्दी गयी हमेशा जल्दी मैं रहती है कम्बख़्त पॅसेंजर ट्रेन तो मेरे घर के पीछे रुक जाती है उसको सिग्नल भी कोई नही देता लोग कूद कर अंगड़ाई लेते हुए इधर उधर ताकते हैं नज़र मेरी भी पड़ती है उधर फिर सोचने लगता हूँ की ये सब कहाँ से चले थे और कहाँ जा रहे होंगे सफ़र कहाँ से कहाँ का है ये शहर इनकी मंज़िल है या एक और ट्रेन बदलनी है आगे वाले स्टेशन से मुझसे इन रैल्गाड़ियों का नाता सा है कुछ मैं…

Jism Tarasha tha tumhara

Aaj Tumhara Din Hai

शब भर रहे

शबभररहे बहकेबहकेख्वाब आँखखुलतीरही ज़हनखुलतागया सन्नाटेकेशोरसे वोजोबारिशकीछतपटाहतथी