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रेत के बने मकानों मैं

रेत के बने मकानों मैं
फूलों का बगीचा नही होता
ना आती है दरीचों से
ताज़ा ख़ुशनुमा बहार
ना पनपते हैं
नये पुराने रिश्ते
वो मंज़र भी नही आता
जब आप किसी के हो जायें
रेत के मकान तो बनते हैं
ढह जाने के लिए
इस ज़िंदगी की तरह
ख्वाब भी ऐसे ही होते हैं
ख्वाबों मैं मगर
फूलों के बगीचे तो होते हैं !

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Mulakaat

- संदीप कुलश्रेष्ठ इक मुलाकात से दो ख़याल मिलते हैं और ख़यालों के दौर मैं कुछ उलझनें सुलझ जाती हैं कुछ सुलझी हुई खामोशियाँ बिखर जाती है सवरने के लिए कुछ पैघाम आते है कुछ ख्वाहिशें मुस्कुराती है कुछ नये वादे मुकम्मल होते हैं कुछ माज़ी मैं क़ैद ही रहते हैं रहने ही चाहिए, शायद आओ इक मुलाक़ात करें और रुख़ करें साहिल की जानिब जहाँ मंज़िल का कोई फलसफा नहीं बस बैठे ही रहना है ख़यालों के दरमियाँ

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